**Chapter 1: संघर्ष की शुरुआत**
रवि, एक 18 साल का लड़का, दिल्ली की तंग गलियों में एक डिलीवरी बॉय के रूप में काम करता था। उसकी जिंदगी बेहद साधारण थी—सुबह जल्दी उठना, साइकिल पर सामान लादकर शहर के अलग-अलग हिस्सों में डिलीवरी करना, और दिन के अंत में थक कर घर लौट आना। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए रवि ने स्कूल छोड़कर जल्दी ही काम शुरू कर दिया था।
रवि की मां घर में कपड़े सिलती थीं और पिता बीमारी के कारण बिस्तर पर थे। रवि के कंधों पर परिवार का भार था, लेकिन उसके सपने इससे कहीं बड़े थे। वह बस खुद को और अपने परिवार को इस जिंदगी से बाहर निकालना चाहता था। हर रोज़ वह सोचता था कि कैसे कुछ ऐसा करेगा जो उसकी जिंदगी बदल दे।
काम करते हुए रवि का सामना अक्सर मुसीबतों से होता था—कभी ट्रैफिक की परेशानी, कभी गुस्साए ग्राहकों का सामना, और कभी-कभी कंपनी में काम करने वाले कुछ साथी उससे ईर्ष्या करते थे। उनमें से एक था राकेश, जो हमेशा रवि की मेहनत को कम करने की कोशिश करता रहता था। राकेश को लगता था कि रवि उसकी जगह आगे बढ़ रहा है, और यह बात उसके दिल में जलन पैदा करती थी।
एक दिन, जब रवि की उम्र 19 के करीब थी, उसे एक बड़ी डिलीवरी के लिए भेजा गया। वह यह काम खुशी-खुशी कर रहा था, क्योंकि इससे उसे कुछ ज्यादा पैसे मिलने वाले थे। लेकिन राकेश ने उसकी बाइक के ब्रेक के साथ छेड़छाड़ कर दी थी, ताकि वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाए। रवि ने बिना किसी शक के बाइक चलाई, और एक सुनसान रास्ते पर अचानक ब्रेक फेल हो गए। बाइक तेज रफ्तार में एक पेड़ से टकरा गई, और रवि सड़क पर दूर जा गिरा।
अस्पताल में कई दिनों तक कोमा में रहने के बाद, जब रवि ने अपनी आंखें खोलीं, तो उसे महसूस हुआ कि कुछ बदल चुका है। उसके शरीर में अजीब सा बल आ गया था। उसके घाव तेजी से ठीक हो रहे थे, और उसके हाथों में अजीब शक्ति महसूस हो रही थी। डॉक्टर भी उसकी तेजी से ठीक होती हालत देखकर हैरान थे। उसे धीरे-धीरे एहसास हुआ कि वह अब सिर्फ एक आम इंसान नहीं रहा—उसके भीतर कुछ असाधारण शक्तियाँ थीं।
रवि की जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही।



