श्री गणेशाय नमः
कहानी तो आपने बहुत सारी सुनी होगी राजा रानी की, चोर सिपाही की, कुछ प्रेम की तो कुछ बदले की, कुछ भूतो की तो कुछ ख़ुफ़िया, पर ये कहानी इन सबसे अलग है ।
तो हुआ यु की एक लड़की थी, उस लड़की का नाम था चित्रलेखा , हम सब प्यार से उसे चित्रा बुलाते है , उसे कहानिया बहुत पसंद थी वो जहा भी जाती उसे उस जगह की कहानी सुनना और उसे महसूस करना बहुत अच्छा लगता था , उसे ये जानने में बहुत इंट्रेस्ट रहता था की वो जहा जा रही है , वहा का इतिहास क्या है , आज से पहले यहाँ क्या हुआ होगा , पुरानी चीजों से तो उसको लगाव सा था ।
तो चलो चलते है उस लड़की के घर की और, जहा उसके पिताजी है जो एक मेडिकल की शॉप चलाते है , मम्मी है जो घर के काम के अलावा अपना एक बुटीक चलाती है, एक बड़ी बहन है जिसकी शादी हो गयी और वो आपने बेबी शावर के बाद यहाँ आयी हुयी है ।
उनके घर में उसकी दादी की एक पेटी थी, चित्रा उसके बारे में हमेशा से जानना चाहती थी की उसमे क्या है पर जब भी वो पेटी के बारे में अपने मम्मी पापा से पूछती वो लोग मना कर देते, " देख चित्रा ये पेटी तेरे काम की नहीं है, ये पुरानी सी पेटी है, इसमें ऐसा कुछ नहीं है" ।
चित्रा हमेशा सोचती की इस पेटी में ऐसा क्या होगा की ये लोग इसे खोलने से मन कर देते है ।
अब उसने निश्चय किया की आज रात वो इस पेटी को खोल ही लेगी , अपनी दीदी को सोया देख वो बिस्तर से उठी और उस पेटी की तरफ जाने लगी अब वो स्टोर रूम में गयी और पेटी को वो ढूढने लगी तभी उसकी नज़र ऊपर रखे छज्जे पर पड़ी वो पेटी वहा थी अब चित्रा को वो पेटी उतारनी थी वो सोच ही रही थी की कैसे नीचे उतारू उतने में उसके पापा पानी पीने उठे, उनको स्टोर रूम में कुछ हलचल दिखी और वो स्टोर रूम में गए ।
“अरे चित्रा तुम यहाँ क्या कर रही हो “
चित्रा ने बोखलाहट में कहा पापा वो मुझे नींद नहीं आ रही थी तो स्टोर रूम में मेरी पुरानी कहानी ढूढने आ गयी थी ।
पापा ने चलो अब बहुत रात हो गयी है ।
चित्रा मन ही मन बोली : आज फिर से वो पेटी मेरे हाथ आते आते बच गयी पर अगली बार में उसे लेकर ही रहूंगी और अंदर से देख लुंगी की आखिर उसमे ऐसा क्या है ।
अगले दिन मम्मी और पापा दोनों दीदी का चेक अप करवाने के साथ डॉक्टर के पास गए और चित्रा घर पर अकेली थी तभी उसने किसी को फ़ोन किया ।
हैलो
उधर से किसी लडके की आवाज आयी : हैलो चित्रा बोलो क्या हुआ ।
तभी चित्रा ने कहा की आज में घर पर बिलकुल अकेली हु तुम तुम आ जाओ अभी ।
तभी उधर से आवाज आयी क्या बात है तुम सच कह रही हो न की में वहा आ जाऊ और तुम बिलकुल अकेली हो ।
चित्रा ने कहा की हां साहैब जी हा तुम आ जाओ ।
वो लड़का जैसा था वैसा का वैसा चित्रा की घर की तरफ दौड़ा कि कही मौका हाथ से चूक न जाए ।
रास्ते में उस लडके ने सोचा की में और चित्रा तो सिर्फ अच्छे दोस्त है हा ये अलग बात है की में उससे बहुत प्यार करता हु पर मेने अभी तक उसको अपने प्यार का इज़हार नहीं किया फिर चित्रा ने मुझे फ़ोन करके ऐसी बात क्यों बोली ।
अब जो भी हो मुझे वह जाकर ही देखना होगा की आखिर बात क्या है ।
अब आप सोच रहै होंगे की यार ये लड़का कोन है तो तो इस लडके का नाम है केशव और प्यार से लोग मुझे केशु भी कहते है ।
में और चित्रा बचपन से एक दूसरे के साथ है, स्कूल साथ में किया, सब्जेक्ट सेम टू सेम लिया या आप ऐसा कह सकते हो की जो उसने लिया वो मेने भी ले लिया उसके खातिर ।
पर कभी उसने मुझे न तो प्यार के लायक समजा न ही प्यार से देखा, बस हमेशा हुकुम की बारिश ।
पर आज बात कुछ और थी उसने इतने प्यार से घर बुलाया और कहा की आज में घर पर अकेली हु ।
क्या बात होगी जाकर ही पता चलेगा ।
बस में पहुंच गया चित्रा के घर ।
मेने डोर बेल बजायी ।
चित्रा ने दरवाजा खोला और बहुत प्यार से बोली जल्दी से अंदर आ जाओ कोई देख न ले ।
मेने बड़े विचित्र अंदाज में बोलै देख लेगा तो क्या हो जायेगा ।
तभी वो बोली तुम नहीं समझोगे ।
में वैसे भी कुछ समजने की हालत में नहीं था. तभी चित्रा ने कहा तुम्हारी हार्ट बीट इतनी फ़ास्ट क्यों चल रही है भाग के आये हो क्या,
अब में उसे कैसे समजाउ की ये इतनी फ़ास्ट क्यों चल रही है, तभी मेने उससे धीरे से कहा की मेरा 1st टाइम है शायद इसीलिए इतना फ़ास्ट चल रही है ।
अब उसने कहा मेरा भी ये पहली बार ही है पापा ने कभी इतनी छूट नहीं दी की ऐसा करू ।
मेने कहा तो आज कैसे ।
तो उसने कहा की मेने भी पक्का कर लिया था की आज जब वो जायेंगे तो में जानकर रहूंगी की आखिर उसमे ऐसा क्या है जो जो ये लोग हमेशा इसे खोलने से मन करते है ।
तभी मेने कहा पर इतनी जल्दी कैसे होगा ।
चित्रा ने कहा देखो हमारे पास २ घंटे है इन २ घंटो में कैसे भी करके हमे वो देखना है ।
मेने कहा सिर्फ देखना है ।
तभी उसने कहा हा बुद्दू मुझे हमेशा से ही देखना था की उस पेटी में आखिर ऐसा क्या है जो पापा ने मुझे उसे देखने से रोका था ।
मेरे दिल के सारे अरमानो पर उस पेटी ने १ मिनट में पानी फेर दिया ।
तभी उसने चौक कर कहा की मेने तो तुम्हे नहीं बताया की हम पेटी खोलकर देखने वाले है फिर तुम्हे कैसे पता ।
मेने कहा अरे तुम्हारी हर बात में बिना कहै ही जान जाता हु इतना.........
आगे कुछ कहु उससे पहले ही उसने कहा चलो अब टाइम वेस्ट नहीं करते है और काम पे लगते है.
मेने कहा चलो कहा है तुम्हारी वो पेटी ।
तभी वो मुझे स्टोर रूम में लेकर गयी और कहा वो वहा है ।
मेने कहा अरे बाप रे इस पुरानी सी पेटी के लिए तुम इतना कर रही थी और में जोर से हँस पड़ा ।
तभी उसने कहा की अरे केशु मुझे इस पेटी की भी कोई न कोई कहानी लगती है, मेरा दिल कहता है इस पेटी के पीछे कोई न कोई राज छिपा है जो मम्मी पापा मुझे नहीं बता रहै है ।
मेने कहा चलो कोई नहीं आज इस राज़ से पर्दा उठा देते है ।
तभी मेने उस पेटी को उतारा और नीचे रखा ।
पर हमारी किस्मत वह भी धोखा दे गयी उसमे पुराने ज़माने का बड़ा सा ताला लगा था मेने कहा चित्रा पेटी तो ढूंढ दी अब चाबी भी दे दो तो हम तुम्हारे राज़ पर से परदा उठा दे ।
उसने कहा यार मुझे नहीं पता था की इस पर कोई ताला जैसा भी होगा ।
मेने हसकर कहा की यार अगर इसमें इतना गंभीर कोई राज़ है तो इसे कोई खुला तो छोड़ेगा नहीं अब चाबी ढूंढो ।
तभी चित्रा ने गौर से उस ताले को देखा तो उसने कहा इसकी चाबी भी बड़ी विचित्र है ये तो चाबी से नहीं किसी सूर्य जैसे दिखने वाले गोल लॉकेट से खुलेगा और वो लॉकेट मेने कही तो देखा है, मुझे याद नहीं आ रहा परन्तु मेने कई बार मम्मी पापा से पूछा था इस पेटी के बारे में तो उन्होंने भी यही कहा था की इसकी चाबी के बारे में किसी को कोई पता नहीं पर आज मुझे पता चला की ये किसी गोल लॉकेट से खुलेगा पर मुझे याद नहीं आ रहा की वो लॉकेट मेने कहा देखा, तभी चित्रा चौक के बोली है याद आया केशु वो लॉकेट मेने दादी के गले में देखा था दादी कहती थी की ये हमारा खानदानी लॉकेट है और ये बहुत सारे राज़ जनता है मतलब वो इसी राज़ के बारे में कहती थी ।
मेने पूछा की क्या मम्मी पापा को पता है की ये इसी लॉकेट से खुलता है ।
चित्रा ने कहा पता नहीं पर अभी मुझे तो ये भी नहीं पता की वो लॉकेट कहा है जब तक वो नहीं मिल जाता मुझे कैसे पता चलेगा की इसमें क्या है ।
बस हमारे २ घंटे इसी में बीत गए की वो लॉकेट कहा है और उसे कैसे हासिल किया जाये, तभी मम्मी पापा भी आ गए और हमने वापस उस पेटी को उसकी जगह पर रख दिया ।
तभी चित्रा के पापा ने कहा अरे केशव कब आये मेने कहा बस अंकल अभी जस्ट आया हु, इधर से गुजर रहा था तो सोचा चित्रा से मिल लू| तो आंटी ने कहा की बेटा चाय पी कर जाना ।
मेने कहा नहीं आज नहीं आज थोड़ा काम है ।
मेने चित्रा को गुड बाय कहा और वहा से चला गया ।
तभी चित्रा ने मम्मी पापा से पूछा डॉ. ने क्या कहा बेबी केसा है आदि आदि ।
और चित्रा की मम्मी ने उसके पापा से कहा वो सब तो ठीक है पर आपने सोचा बेबी होगा तो कुछ न कुछ सोने का गहना देना पड़ेगा तो उसके पापा ने कहा की देखो कुछ पुराने गहने निकालो, उसी में से कुछ बनवा लेते है वैसे भी घर की स्थिति कुछ सही नहीं है ।
चित्रा की मम्मी ने अलमारी में से कुछ पुराने गहने निकले और बताने लगी की क्या है ।
तभी चित्रा आती है और पूछती है मम्मी शाम को खाने में क्या बनाऊ ।
मम्मी ने कहा की जो मर्जी हो बना ले बस तेरी दीदी से पूछ ले की उसको कुछ स्पेशल बनाना हो तो बना दे ।
ये सब बाते चल रही थी की चित्रा की नज़र उस लॉकेट पर गयी जिसके लिए मम्मी कह रही थी की इसको तुड़वाकर कुछ नया बनवा लेते है ।
तभी चित्रा जोर से चिल्लाई नहीं ये दादी का है और हमारा खानदानी है में इसे नहीं देने दूंगी ।
फिर चित्रा ने पूरी बात मम्मी पापा को बताई और कहा की ये लॉकेट कोई ऐसा वैसा लॉकेट नहीं है ये बहुत से राज़ जानता है, आप केशु से पूछ लो ।
तभी उसने मुझे फ़ोन करके घर बुलाया की यार यहाँ आ जाओ वो चाबी मिल गई है, मेने कहा ठीक है में आता हु ।
अब जैसे ही में घर पहुंच वो पेटी बीच में पड़ी थी और सभी लोग उसके चारो तरफ बैठे थे, अंकल ने कहा प्लीज इस पेटी को नहीं खोलो तो ही अच्छा है, मेने पूछा की अंकल इस पेटी में ऐसा क्या है ।
तो उन्होंने कहा की मेने भी कभी इसको खोलकर नहीं देखा क्यों की मुझे तो पता ही नहीं था की इसकी चाबी ये हमारा खानदानी लॉकेट है मुझे तो ऐसा ही बताया गया था की इसकी चाबी कही गुम हो गयी है पर आज जब मुझे चित्रा ने बताया की इसकी चाबी ये लॉकेट है तो मुझे भी जानना है की आखिर इसमें ऐसा क्या है कही कोई खज़ाना तो नहीं है जिससे हमारी ज़िन्दगी बदल जाये ।
और हम सब हँस पड़े ।
अब मेने उस चाबी को उस ताले में फिट किया और घुमाने की कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ तभी चित्रा ने कहा की ये ऐसे नहीं घूमेगा इसके बीच में जो सूर्य की नाक है उसको प्रेस करो जिससे वो अंदर चली जाएगी और फिर घुमाओ ।
अब हम सभी उसकी तरफ देख रहै थे की इसको ये सब कैसे पता ।
तो उसने कहा की वो मेने एक कहानी में ये पढ़ा था ।
और हुआ भी ऐसा ही जैसे ही मेने बीच में से प्रेस किया वो चाबी बन गयी और ताला खुल गया ।
अब उसमे और कुछ नहीं बस एक किताब थी जिसमे सब कुछ उल्टा लिखा था ।
तब चित्रा ने कहा : ये सब क्या है पापा ।
पापा ने कहा “ये तो मुझे भी नहीं पता की दादा जी की वो सब बाते जो उन्होंने इस किताब के बारे में कही थी वो सब कुछ सही है” ।
चित्रा ने कहा की क्या कहा था दादाजी ने :
अब अंकल ने बताना शुरू किया की जब में बहुत छोटा था तो दादाजी मुझे अपने ही खानदान की कहानी सुनते थे ।
बहुत समय पहले की बात है, लगभग चित्रा से ८ पीढ़ी पहले जब हम ऐसे काम नहीं करते थे हम गांव गांव जाकर लोगो का मनोरंजन करते थे और उन्हें कहानियो के माध्यम से नये नये खेल दिखाते थे ।
हम हर गांव में लगभग महीना भर रुकते थे और वापस दूसरे गांव की तलाश में निकल जाते थे ।
फिर जब बारिश सुरु होती उससे पहले हम अपनी हवेली में लोट आते थे ।
हमारी हवेली जैसलमेर के पास एक गांव में थी ।
तभी चित्रा ने पूछा की क्या वो आज भी हमारी है ।
तो पिताजी ने कहा की, वो आज भी हमारी है परन्तु अब वो बहुत पुरानी और जर्जर हो गयी है तो वहा कोई रहता नहीं बहुत बार मेने बेचने की कोशिश की परन्तु वो नहीं बिकी ।
पता नहीं लोग वह जाते और वापस कभी फ़ोन नहीं करते तो मेने भी उससे आस छोड़ दी की इससे मुझे कुछ पैसा मिलेगा
फिर चित्रा ने कहा पापा आगे क्या हुआ कहानी में ।
तो पापा वापस कहानी पे आते है और कहते है की ।
ये तब की बात है जब हम एक गांव में एक लुटेरे की कहानी पर नाटक कर रहै थे, और वो पूरा होने के बाद हवेली की तरफ जार रहै थे, तभी उन्होंने देखा की दो लुटेरे के गुट आपस में लड़ाई कर रहै थे और एक दूसरे को मार रहै थे, हमारे परिवार के लोग छुपकर इस लड़ाई को देखने लगे जब वो लड़ाई कर रहै थे तो सभी ने एक दूसरे को मार दिया और अब सिर्फ दोनों गुटों के सरदार ही बचे थे जो एक दूसरे के जान के दुश्मन थे ।
दोनों ने एक दूसरे को बहुत मारा और अंत में एक गुट का सरदार जीत गया और कहा की ये सब खज़ाना मेरा है परन्तु भाग्य की बात वो इतना घायल हो चूका था की ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था तो हमारे लोगो ने उसको और उसके ख़ज़ाने को दोनों को हवेली में ले आये और उसकी दिन रात सेवा की, पर अफ़सोस वो नहीं बच पाया, फिर सभी ने उस ख़ज़ाने को देखा तो वो इतना था की इनकी ८ पीढ़ी भी बैठी बैठी खाये तो भी ये ख़तम नहीं हो ।
इससे अब इन लोगो ने कही आना जाना छोड़ दिया और इसके स्वामित्व के लिए लड़ाई होने लग गयी, सब उस पर अपना अपना हक़ जताने लगे ।
फिर घर के सबसे बड़े सदस्य होने के कारन मेरे पड दादा ने उसको कही छिपा दिया और इस किताब में एक छोटी से कहानी लिख दी जो की एक श्लोक जैसी है ।
और वही श्लोक ख़ज़ाने तक जाने का रास्ता बताता है ।
में हमेशा से ही इन सभी कहानियो को सही नहीं मनाता था पर जब इस लॉकेट का संबंध इस ताले से है तो समझ में आया की इस कहानी का भी उस ख़ज़ाने से जरूर होगा ।
चलो चित्रा इस किताब को पढ़ो ।
अब चित्रा ने धीरे से इस किताब को निकला और पढ़ना शुरू किया ।
उस किताब में सिर्फ वही कहानी थी जिससे वो लोग मनोरंजन करते थे पर सबसे खास बात वो एक पेज था जिस पर लिखा था ।
नीली है छाया जिसकी, बहुत ऊँचा है कद
जोर जोर से हिलता जाए, खूब दिखाए रंग
बीच में जब भी तुम जाओगे, हो जाओगे दंग
फल अगर तुमको है खाने, तो चलो फिर तुम उसके संग
मृगाः मुखे प्रविशंति सिंहस्य सुप्तस्य हि न
मनोरथैः न कार्याणि सिध्यन्ति हि उद्यमेन
जैसे ही कहानी ख़तम हुयी सब ने अपने हाथ सर पर रख लिए क्यों की किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था की आगे करना क्या है क्यों की कहानी में कुछ नहीं था जो भी था वो इन्ही लाइन में था जो की अजीब सी थी ।
फिर चित्रा ने कहा की अब तो जब किसी को कुछ पता नहीं चल रहा है तो हमे एक ही काम करना चाहिए क्यों न हम वही जाए जहा ये कहानी लिखी गयी थी ।
मतलब हमे वही जाना चाहिए हमारी पुरानी हवेली
अब हमने बैग पैक कर लिए और निकल गए हमारी हवेली पर ।
तभी चित्रा ने कहा की तुम भी चलो तो ज्यादा अच्छा है, मेने कहा क्यों में चलु ये तो तुम्हारा घर का मामला है और अंकल आंटी क्या सोचेंगे ।
तो चित्रा ने कहा जो सोचना है सोचने दो मुझे तुम्हारा साथ हर जगह चाहिए ।
तो मेने कहा क्यों
उसने कहा बस ऐसे ही तुम्हे नहीं देना हो तो मत दो वो तुम्हारी मर्जी ।
मेने कहा चित्रा मुझे तो देना ही है तुम्हारा साथ और में तो पूरी ज़िन्दगी तुम्हरा साथ देना चाहता हु बस तुम ही हो जो कभी समझ नहीं पायी ।
तभी उसने कहा अरे केशव जी मेने सिर्फ वहा तक के लिए कहा और तुम क्या समज रहै हो ।
वैसे मुझे नहीं चाहिए तुम्हरा साथ पूरी ज़िन्दगी पर अगर तुम देना चाहते हो तो वो तुम्हारी मरजी है में तुम्हे रोकूंगी नहीं और हम दोनों हंस पड़े ।
अब सुबह जल्दी हम हवेली की तरफ निकल पड़े ।
में अंकल और चित्रा हम तीनो शाम तक वहा पहुंच गए ।
अंकल ने सुबह ही फ़ोन कर दिया था की हम लोग आ रहै है तो चौकीदार ने साफ सफाई कर दी और कुछ खाने की व्यवस्था भी कर दी ।
अब हम सुबह के थके हुए थे तो जल्दी नींद आ गयी ।
रात के करीब ३ बजे थे की मेरी आँख खुली, में पानी पीने निचे गया और फ्रीज़ खोलकर पानी पीने लगा तभी वहा से मुझे कुछ लोगो के बोलने की आवाज आयी, जब धीरे से डरते हुए में वहा गया जहा से आवाज आ रही थी तो देखा की चौकीदार कुछ लोगो से बात कर रहा था ।
चौकीदार : पता नहीं इतने साल बाद इनको इस हवेली की याद कैसे आयी, और मुझे तो लगता है की ये लोग कुछ न कुछ करने आये है अब पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा है ये लोग ख़ज़ाने के लिए आये है ।
तभी सामने वाला : अरे तू काहै फ़िक्र करता है, यहाँ जो भी आता है वो बिना कुछ लिए ही वपास चला जाता है, वो जो रहता है यहाँ ।
मुझे कुछ समझ नहीं आया की वो किसकी बात कर रहै है, कौन लोग पहले आये थे यहाँ और ऐसा कौन रहता है जो यहाँ से खजाना नहीं ले जाने देगा, ये सभी सवाल मुझे चुभने लगे की अंकल ने हमसे ऐसा क्या छुपाया ।
इन सब सवालो को जानने के लिए मुझे सुबह तक का इंतज़ार करना था खेर रात बहुत हो गयी तो में सुबह के इंतज़ार के लिए सोने चला गया ।
सुबह हुयी और मेने नाश्ते की टेबल पर अंकल से सवाल पूछा ।
अंकल क्या हमसे पहले भी यहाँ कोई आया था क्या ।
अंकल : मुझे नहीं पता केशु, पर तुम ये सब क्यों पूछ रहै हो ।
तब मेने अंकल को रात की सारी कहानी बताई ।
तभी अंकल बोले : एक बात तो दादाजी की में बताना भूल गया था ।
जब २ लुटेरे आपस में लड़ाई कर रहै थे और एक लुटेरे को हम यहाँ इलाज के लिए लेकर आये थे, वो यही मर गया था और दादाजी ने कहा था की जहा हमारे पूर्वजो ने वो खजाना छुपाया था वह हमारे पड़ दादा जी ने उसकी अस्थिया भी रख दी थी , तभी से उसकी आत्मा खजाने की रक्षा भी कर रही है ।
अब मेरी समझ में सब कुछ आ गया था ।
अब हमने नाश्ता किया और पूरी हवेली में तलाशने लग गए की आखिर खजाना कहा है ।
हमने पूरी हवेली तलाश कर ली परन्तु कही भी कोई खजाना तो छोड़ो खजाने का सुराग तक हाथ नहीं लगा.
अब हम थक हारकर बैठ गए, मेने चित्रा से कहा ।
यार सुबह से शाम हो गयी हम लोगो ने पूरी हवेली छान मरी परन्तु कही कुछ नहीं मिला, यहाँ कुछ होगा भी या नहीं.
चित्रा : यहाँ जरूर कुछ न कुछ होगा अगर नहीं होता तो इतना सबकुछ नहीं होता, वो पेटी, उसकी चाबी और उसमे एक रहस्य ।
तभी चित्रा कहते कहते रुक गयी।
मेने कहा क्या हुआ
तब उसने कहा
अरे याद है उस किताब में एक पेज था जिसमे रहस्मयी कविता थी, हो सकता है वही हमे खजाने तक पहुचाये ।
अब में भी सोचने लगा, में सोच ही रहा था की मुझे कुछ अजीब सा लगा मेने कहा ये यहाँ नील रंग की परछाई आ रही है, जब हमने हवेली के ऊपर देखा तो देखा हवेली के सबसे ऊपर एक गोल गुम्बज है जिसमे नील रंग के पुराने कांच लगे है (पुराने ज़माने में कांच को पिघल कर खिड़कियों में भरा जाता था जो की बहुत मजबूत होते थे), उसमे से शाम को सूरज की रौशनी निकलकर निचे जमीन पर पड़ रही है, तो ऐसा लग रहा है मानो उसकी परछाई नीली हो ।
हमे एक लाइन का जवाब तो मिल गया,
अब दूसरी लाइन ढूंढनी थी जोर जोर से हिलता जाए खूब मचाये रंग.
अब इसका मतलब जानने के लिए हमे उस गुम्बद के बीच में जाना पड़ेगा,
हम उस गुम्बद तक जाना चाहते थे परन्तु वहा जाने के लिए हमे ऊपर के दरवाजे की चाबी चाहिए थी,
चित्रा ने पापा से पूछा
पापा ये ऊपर जाने वाले रस्ते पे इतना बड़ा ताला क्यों लगा है, पापा ने कहा मुझे भी नहीं पता पर दादाजी कहा करते थे की ऊपर कभी मत जाना, और मुझे ये भी नहीं पता की उस ताले की चाबी कहा है,
हा वो कहा करते थे की इस ताले की कोई चाबी नहीं है ये खुद ब खुद खुलता है पर कैसे खुलता है ये पता नहीं
बहुत से लोगो ने इसे तोड़ने की कोशिश की पर नहीं तोड़ पाए.
अब हम हताश हो गए की आखिर उस ताले को खोले केसे ,
चित्रा : चलो केशु हम उस ताले को गौर से देखते है क्या पता उसमे से कुछ मिल जाए
मेने कहा चलो ये सही है हम अभी जाकर देखते है उसमे ऐसा क्या है,
चित्रा और हम दोनों ऊपर उस ताले के पास गए और गौर से उस ताले को देखा पर कुछ भी साफ़ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था, तभी चित्रा की नज़र ताले पे बानी आकृति पे पड़ी ताके के एक छोर पर शेर था और वो सो रहा था तथा दूसरे छोर पर एक हिरन बना था जो की खड़ा हुआ था,
मेने कहा की हो न हो इसी में इस ताले को खोलने का रहस्य छुपा हुआ है.
पर क्या हो सकता है वो पता नहीं,
अब इसी उधेड़बुन में रात हो गयी हम सभी पूरी रात उसी बारे में सोचते रहै पर कुछ भी हासिल नहीं हो पाया.
अब सुबह सुबह हम उठे तो बहुत देर हो गयी थी क्यों की पूरी रात हम उसी बारे में सोचते रहै, की आखिर इसका क्या रहस्य है,
तभी चित्रा ने चाय लेकर दी और अब में और चित्रा चाय पी रहै थे, चित्रा ने कहा केशु बहुत हुआ चलो आज हम पूरा गांव देखेंगे,
मेने भी कहा हा सही है हम जब से यहाँ आये है बहुत उलझ से गए है,
अब में और चित्रा गांव घूमने निकल गए
सचमुच में ये गांव किसी जन्नत से काम नहीं था
हम बहुत सी जगहों पर घूमे झरना, पेड़ , नदी , पहाड़ दिल बहुत खुश हो गया, तभी चित्रा ने कहा की चलो यहाँ की चाय पी जाये मेने कहा चलो.
अब हम छोटी सी टापरी पे चाय का आनंद ले रहै थे तभी चाय वाला बोला
क्यों बाबूजी यहाँ नए नए हो क्या,
मेने कहा
हा काका वो पास वाली हवेली में आये है कुछ दिन रहने,
तभी चाय वाला
अरे उस भूतिया हवेली में आप रहने आ गए बाबूजी,
तभी चित्रा बोल पड़ी
अरे काका भुत को भुत से क्या डर
और हम सभी हंस पड़े,
तभी वह एक हादसा हुआ ..
एक अनजान व्यक्ति अपने बच्चे को बहुत बुरी तरह से डाटपिट रहा था,
और कह रहा था की तुजे पढ़ने लिखने भेजा था और तू यहाँ वहा खेलता रहता है , कुछ काम नहीं करता ऐसा कैसे चलेगा, क्या कोई तुझे कमा कर थोड़े ही देगा
मेहनत तो तुजे करनी ही होगी ना. में ज़िंदा हु तब तक खिलाऊंगा मेरे मरने के बाद क्या होगा.
शेर को भी शिकार करने के लिए दौड़ना पड़ता है, कोई उसको बैठे बैठे खाना नहीं मिलता है.
अब में बीच में बोल पड़ा कहा
अरे काका क्यों मार रहै है बच्चे को बड़ा होगा तो अपने आप समझ जायेगा.
फिर मेने और चित्रा ने काका को समझाया और वापस हवेली पर आ गए.
अब हम वही बात को लेकर वापस लड़ने लग गए
चित्रा : वो काका सही कर रहै थे, उस लड़के को मेहनत करनी चाहिए.
में : नहीं यार वो बहुत छोटा है बड़ा होगा तो अपनेआप सिख जायेगा
तभी चित्रा ने एक श्लोक बोला :
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगाः।
और कहा इसका मतलब है की सोते हुए शेर के पास हिरन कभी नहीं आता है, उसको दौड़ना ही पड़ता है,
तभी मेने कहा क्या कहा तुमने ये जो श्लोक बोला है ये कही ना कही सुना है मेने कुछ कुछ शब्द इसके मुझे जाने पहचने से लग रहै है
उसने कहा मेने तो तुम्हारे सामने पहली बार ही बोला है
तभी मेने कहा एक काम करो मुझे वो पेज लेकर दो
चित्रा भाग कर गयी और वो पेज लेकर आयी,
मेने कहा वो पहैली निकालो, हमने वो पहैली देखि परन्तु हमे वो श्लोक कही नहीं दिखा,
तभी मेरी नज़र उस लाइन पर गयी
मृगाः मुखे प्रविशंति सिंहस्य सुप्तस्य हि न
मनोरथैः न कार्याणि सिध्यन्ति हि उद्यमेन
मेने कहा इसको सीधा नहीं उल्टा पढ़ो
हम पूरी तरह से आश्र्यचकित थे की कितना कमाल का दिमाग था उन लोगो में,
फिर हम उस ताले के पास गए, और देखा की वह जो शेर की आकृति थी वो सोई हुयी थी, हमने उसको हिरन के पास जोड़ दिया, और ये क्या ताला खुला नहीं परन्तु एक खट की आवाज आयी, मेने कहा अब क्या है इसको अब तो खुलना चाहिए न और ऐसा कह कर मेने जोर की लात दरवाजे को लगायी और दरवाजा खुल गया,
तभी चित्रा ने कहा की ये ताला खुलता ही नहीं है, तभी बहुत से लोगो ने इसको खोलने की कोशिश की होगी परन्तु नाकामयाब रहै होंगे, क्यों की ये ताला है ही नहीं ये तो सीधा इस दरवाजे से जुड़ा है,
फिर में चित्रा और अंकल तीनो अंदर गए,
अंदर का नज़ारा देखकर हम सभी स्तब्ध रह गए , वो इस महल की सबसे ऊँची जगह थी और वह से पूरा गांव दिखाई देता था, मेने कहा यार चित्रा तुम तो राजकुमारी निकली , तभी उसने कहा है तो मेंने तो पहले की कहा था की में किसी राजकुमारी से कम थोड़ी हु,
और हम तीनो हँस दिए |
फिर हमने देखा यहा तो ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा जिससे हमे ये पता लगे की खज़ाना कहा है,
तभी उस कमरे में कुछ गुंडों के साथ एक आदमी अंदर आता है और कहता है, क्या बात है चित्रा और मेरे बड़े भैया, जो काम में इतने सालो में नहीं कर पाया वो तुम लोगो ने कुछ ही दिनों में कर दिया.
तभी उनके साथ वो चौकीदार भी आया और उस अनजान आदमी ने कहा कहा की तुम्हे क्या लगता है ये तुम्हारा आदमी है , ये मेरा आदमी है और यहाँ की सारी खबरे मुझे देता था |
अब तुम लोग मेरे लिए ये खज़ाना ढूंढोगे नहीं तो मेरे आदमी तुम लोगो का क्या हाल करेंगे वो तुम अच्छी तरह से जानते हो |
फिर मेने चित्रा के पापा से पूछा अब ये कौन है , तब उन्होंने कहा ये मेरा छोटा भाई है, और ये कब से इस खजाने को खोजने में लगा है, इसके पास इतना पैसा है फिर भी इसको इस खजाने की पड़ी है, ये कहता है इस खजाने की कीमत कम से कम ३०० करोड़ होगी , पर मुझे नहीं पता था की ये यहाँ तक पहुंच जायेगा |
तभी चित्रा ने हमारी बात सुनी और कहा “३०० करोड़ “
और मेने चित्रा से कहा “फिर तो हम बहुत पैसे वाले बन जायेंगे “
चित्रा : अब ये हम कैसे आ गया,
तब मेने कहा अरे हम शादी नहीं करने वाले है ना |
चित्रा : अरे यार अभी भी शादी की पड़ी है, पहले तुम इन लोगो का कुछ सोचो
में : अरे में कोई साउथ की पिक्चर का हीरो थोड़ी हु की ४-५ लातो में इनको ऊपर पहुंचा दूंगा.
चित्रा बोली : चाचा जी एक काम करते है , हम आपके साथ खजाना ढूंढते है फिर जब खजाना मिल जायेगा तो उसको आधा आधा कर लेंगे
चाचा जी : नहीं मेरी बच्ची चित्रलेखा आधा आधा नहीं, में उस खजाने में से सिर्फ कुछ भाग ही तुम्हे दूंगा जितना मेरी मर्जी होगी.
तभी में बोल पड़ा : ठीक है तो हम सबको मार दो और खजाना ढूँढ सकते हो तो ढूँढ लो.
कुछ सोचने के बाद चाचा जी बोले ठीक है उसमे से २५% में तुम लोगो को दे दूंगा.
में कुछ बोलू उससे पहले ही चित्रा बोली, ठीक है अंकल हमे मंजूर है.
फिर हम उस खजाने को ढूंढने में लग गए.
मेने कहा जरा उस पहैली को मुझे बताओ.
नीली है छाया जिसकी, बहुत ऊँचा है कद
जोर जोर से हिलता जाए, खूब दिखाए रंग
बीच में जब भी तुम जाओगे, हो जाओगे दंग
फल अगर तुमको है खाने, तो चलो फिर तुम उसके संग
मेने कहा : चित्रा हमने 1st लाइन का मतलब तो निकाल लिया अब 2nd लाइन का क्या मतलब हो सकता है
, जोर जोर से हिलता जाये खूब मचाये रंग, यहाँ ऐसा क्या है जो जोर जोर से हिलता है.
हमने चारो तरफ देखा पर ऐसा कुछ नहीं दिखा तभी मेने कहा चित्रा ये बीच में क्या है, उसने कहा ये पुराने ज़माने का पंखा है जब पहले के ज़माने में लाइट जैसा कुछ होता नहीं होगा तो इसी से काम चलता होगा.
मेने कहा : तो ये चलता कैसे होगा
चित्रा : ये तो मुझे नहीं पता और अब में थोड़ी उस ज़माने में थी जो मुझे पता होगा.
मेने कहा : तो चलो ये कैसे चलता है ये पता लगाते है.
मेने चाचाजी को बुलाया और कहा , आप इन गुंडों को मुफ्त की सैलरी देते हो क्या आपको खजाना भी चाहिए और काम भी हमसे ही करवा रहै हो
चाचाजी ने कहा : क्या करवाना है इनसे ये सभी लोग वो करेंगे जो में कहूंगा.
तब मेने कहा की आपको वो जो ऊपर पुराने ज़माने का पंखा दिख रहा है न वो चलाना है अब वो कैसे चलता है मुझे नहीं पता आप आपके गुंडों को बोलो की ये पंखा चलाये,
अब चाचाजी को थोड़ा गुस्सा आ गया , " ये क्या गुंडा गुंडा लगा रखा है तुमने, ये लोग मेरे लिए काम करते है"
मेने कहा ठीक है फिर आप इस पंखे को चला दो
तब चाचाजी ने अपने आदमियों को कहा की देखो ये पंखा कैसे चलता है
चाचाजी ने कहा की अब इस खजाने का इस पंखे से क्या मतलब.
फिर मेने उस पंखे को गौर से देखा तो देखा की ये पंखा यहाँ से नहीं बल्कि नीचे कही से चलता है, फिर मेने चित्रा के पापा से कहा की जब ये महल बनाया होगा तो इसका नक्शा तो होगा ना.
तब अंकल ने कहा मुझे इसका नहीं पता
फिर चाचाजी ने अपनी कोट की जेब से एक ब्लू प्रिंट निकली और कहा ये लो यहाँ का नक्शा.
मेने कहा चाचाजी आपने तो बहुत मेहनत कर रखी है
चाचाजी ने गुस्से से देखा
मेने और चित्रा ने ब्लूप्रिंट लिया और उसमे देखने लगे,
चित्रा : केशु देखो ये जो पंखा है ये इतना बड़ा है की इसे कोई इंसान तो नहीं चला सकता, या तो इसको बेलो द्वारा चलाया जाता होगा या फिर घोड़े के द्वारा ।
मेने कहा : हा चित्रा तुम बिलकुल सही हो, इतना बड़ा पंखा इंसानो से तो नहीं चल सकता है
तब अंकल बोले हा निचे की तरफ एक जगह है जहा घोड़े रखे जाते थे,
शायद वही से इस पंखे के चलने का पता लग जाये
मेने कहा चाचाजी आप मेरे साथ अपने आदमी भेजो,
उन्होंने कहा ठीक है,
तभी मेरे दिमाग में कुछ प्लान बना
मेने कहा अंकल आप अपने सभी आदमिया को मेरे साथ भेजो अगर उस ज़माने में ये पंखा घोड़ो से चलता था तो हो सकता है इस टाइम भी बहुत ज्यादा आदमी चाहिए होंगे,
मेने चित्रा को एक व्हाट्सप किया,
"देखो किसी तरह तुम चाचाजी को सामने वाले छोटे कमरे में ले जाओ और उसमे बंद कर देना, में इन गुंडों को निचे बंद करने की कोशिश करता हु"
तभी चित्रा ने चाचाजी को कहा की चाचाजी क्या आपको पता है यहाँ कोई छोटा कमरा है.
चाचाजी ने कहा, यहाँ एक छोटा कमरा हुआ करता था.
चित्रा : क्या पता वहा से कोई ख़ुफ़िया रास्ता कही जाता हो.
चाचाजी : है एक छोटा कमरा है यहाँ चलो वहा से देखते है,
तभी चाचाजी उस छोटे से कमरे में जाते है और चित्रा उसका दरवाजा बहार से बंद कर देती है ,
इधर केशु भी उन गुंडों किसी तरह से निचे वाले घोड़ो के अस्तबल में बंद करने में कामयाब हो जाता है,
अब केशु वापस चित्रा के पास आता
केशु : चित्रा यहाँ सब ठीक है ना
चित्रा : हा बिलकुल मेने यहाँ सब कुछ ठीक ही रखा है , अब बताओ आगे करना क्या है.
तब मेने चित्रा से वो ब्लू प्रिंट लाने को कहा, तब चित्रा ने कहा की वो तो चाचाजी के कोट में ही रह गयी,
और में बस गुस्से से उसका चेहरा देखता रहा .
चित्रा : अब आगे क्या करना है.
में : वही सोच रहा हु.
मेने कहा चलो चाचाजी के पास चलते है, उनसे बात करते है.
में और चित्रा दोनों चाचाजी के पास जाते है, चित्रा बहार से आवाज लगाती है
चित्रा : चाचा जी , सॉरी मुझसे गलती हो गयी
अंदर से कुछ आवाज नहीं आयी, फिर मेने आवाज लगायी
फिर भी अंदर से आवाज नहीं आयी
मेने कहा क्या हुआ चित्रा तुमने कही चाचाजी को कुछ कर तो नहीं दिया
चित्रा : अरे में ऐसा क्यों करुँगी, मेने तो बस उनसे पूछा की यहाँ कोई छोटा कमरा है जिससे कोई ख़ुफ़िया रास्ता जाता हो तो चाचाजी ने इसी कमरे का जिक्र किया.
में : मुझे लगता है की सचमुच में यहाँ से कोई ख़ुफ़िया रास्ता जाता होगा.
में और चित्रा ने मिलकर धीरे से दरवाजा खोला पर ये क्या चाचाजी तो कही दिख भी नहीं रहै और यहाँ से कोई रास्ता भी नहीं दिख रहा अब में और चित्रा दोनों बुरी तरह फस गए
तभी कुछ ऐसा हुआ जिसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे, हमे एक गोल घूमने वाली हेंडल जैसी कोई चीज दिखी, जैसे ही हमने उसको घुमाया वो पंखा चलने लगा और हम धीरे - धीरे निचे की और जाने लगे
जब में और चित्रा निचे गए तो वहा बिलकुल अँधेरा था बस बीच में हमे कुछ रोशनी दिखाई दी
हम बीच में जैसे ही गए चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश हो गया, और तभी मुझे और चित्रा को वह कोने में चाचाजी दिखाई दिए
चित्रा : अरे चाचाजी आप यहाँ कोने में दुबक के क्यों बैठे है.
तभी चाचाजी ने डरते डरते कहा
बेटी चित्रा तुम यहाँ से चली जाओ चली जाओ
वो जाग गया है जाग गया है ,
में भी चाचाजी के पास पंहुचा और कहा कोन जाग गया चाचाजी और आप इतना क्यों डर रहै हो,
तभी मुझे और चित्रा को लगा की हमारे पीछे कोई आया है, हमने पीछे मुड़कर देखा तो ,,, तो ,,,
बस डर के मारे बुरा हाल था वो लुटेरे के सरदार की आत्मा थी,
मेने कहा चित्रा इसको भागने का कोई मंत्र है क्या ,
चित्रा ने कहा में कोई भूत भागने वाली तांत्रिक नहीं हु,
मेने कहा कुछ तो होगा ने ,
चित्रा ने कहा मेरे पास इस पहैली के अलावा कुछ भी नहीं है
मेने कहा लास्ट वाली लाइन पड़ो
"फल अगर तुमको है खाने, तो चलो फिर तुम उसके संग"
इसका मतलब क्या हो सकता है ,
तभी मुझे एक लोटा दिखा मेने सोचा हो न हो इस लोटे में इस लुटेरे की अस्थिया होगी
मेने तुरंत जाकर वो लोटा उठा लिया अब मेने कहा
तुम्हारी अस्थिया मेरे पास है अगर ज्यादा हमे कुछ भी किया तो में ये अस्थिया इस पानी में डाल,
मुझे नहीं पता था इसका उस आत्मा पर इतना असर होगा की वो आत्मा रोने लगी और हमे कहने लगी,
में तुम्हे कोई नुक्सान नहीं पहुंचना चाहता हु, में बस तुम्हे इतना बताना चाहता हु की ये खज़ाना एक शापित खज़ाना है तुम इसको लेकर जाओगे तो एक शाप भी तुम्हारे साथ ही जायेगा
तब मेने और चित्रा ने उस शाप के बारे में उस आत्मा से पूछा
तो आप हमे उस शाप के बारे में बताओ,
वो आत्मा कुछ काने लगी तभी वो लोटा मेरे हाथ से पानी में गिर गया और वो आत्मा न जाने कहा गायब हो गए,
तभी चारो तरफ से भूकंप जैसा महसूस होने लगा और सभी दीवारे गिरने लगी
में चाचाजी और चित्रा जैसे तैसे करके वह से निकले
फिर मेने चाचाजी के गुंडों को वहा से निकला
तभी चित्रा ने कहा पापा कहा है,
तभी पीछे से पापा आये पुलिस के साथ और कहा में पुलिस लेने चला गया था
और हम सब की जान में जान आयी
फिर हम लोग वापस अपने घर आ गए, में बहुत खुश था क्यों की चित्रा से अपने दिल की बात कह दी थी और चित्रा के दिल की बात मेने जान ली की वो भी मुझसे उतना ही प्यार करती है जितना में उससे करता हु,
फिर चित्रा के घर उसके दीदी को एक नन्ही से परी हुयी ,
हम सब बहुत खुश थे
एक दिन मेने सोचा की यार खज़ाना तो मिल गया पर वो लास्ट वाली लाइन ("फल अगर तुमको है खाने, तो चलो फिर तुम उसके संग") का कोई मतलब क्यों नहीं निकला
मेने कहा छोड़ो यार उस शापित खजाने को में तो मेरी चित्रा के साथ बहुत खुश हु.
""एक रात चित्रा ने अपना वो बेग निकला जो वो खजाने की खोज करने के लिए लेकर गयी थी, वह से उसने कुछ सोने के सिक्को को अपने साथ ले लिए था, उसने वो सोने की सिक्को की पोटली निकली और देखने लगी
वॉव कितना खरा सोना है, और इन सिक्को को देखने में तो लगता है ये बहुत की कीमती होंगे,
तभी चित्रा ने उनमे से एक सिक्को को छुआ ................
और शाप ने उसको जकड लिया ........
TO BE CONTINUE IN PART 2


