महफ़िल सजाओ बेरहमियों एक खता सुनाता हूँ खुदा साथ रहे ना गा सका मगर अब जन्नत के वास्ते लिख गाता हूँ एक इच्छा थी कि ईश्वर खुदा साथ सुनते तो दिल को सुकून मिलता चुनाव यह था कि दो मुल्क आमने-सामने बसा करते थे या तो आप ईश्वर के हो जाओ या तो उनका आशीर्वाद लिए इन मुल्लों की बस्ती में एक गुलाब लेकर फरमाओ खैर वो तो अभी तक उन मंदिरों में ही जाया करते हैं और यहाँ सुनो हम भी कुछ लिख सुनाते हैं...
ईश्वर लिखे हम तो कभी खुदा लिखे हम धर्म और ढोंग बताते हाय अपनों से ही लड़ जाते हम कैसे ना लड़ते आखिर चाँद हमारे उन मंदिरों में ही दिखा करते थे अम्मी से मस्जिद बता मंदिरों वाली सीढ़ियों पे जाया करते थे पाते तो वहाँ कुछ नहीं थे बस अपने महबूब को देखने जाते थे कोई दिख जाए गली मोहल्ले का तो मजाक हमारा उड़ा जाते थे अब खुद को रोकते भी तो रोकते कैसे आखिर हमारे बहाने खुदा खुद उन्हें देखने जाते थे...
डरते तो थे हम उनसे कि कहीं हमें देख वे उलझन में ना पड़ जाए कि ये जनाब क्यों आ जाते हैं बार-बार मगर वे हमें पहचान भी नहीं पाते थे। आखिर हर बार मुखौटे में जो पाते थे, कभी उन्हें लेट होता तो हम सूट पहने टैक्सी वाले बन जाते थे, तो कभी अपने पसंद के लिए महंगे कपड़े उनके द्वार उन्हें सस्ते में बेच जाते थे। नाम तो उनका ना जानते थे, मगर उनके द्वार एक चुटकुले की चिट्ठियाँ जरूर फ़ेंक जाते थे
वे अनजाने हमसे उसे पढ़कर फेंक जरूर दिया करते थे उन चिट्ठियों का मोल तो वे कुछ ना रखते थे, पर ए खुदा तेरी कसम वे उसे फरेबी तो फरेबी समझ पर हँसा जरूर करते थे। नाम बताने से क्या? हम तो अपनी पहचान भी उनसे कराने से डरते थे। बस दिल में एक लौटा डर ये लगा रहता था कि हम यहाँ उन्हें हँसाने के लिए चिट्ठियाँ लिखते रह जाए और वहाँ कोई उन्हें अपना साजन ना बना ले जाए। पर हम उसमें भी खुश रहते थे। चाय वाले बन मुँह छुपा द्वारें तो उनके चले जाते थे, मगर हम उन्हें देख चाहे बनाना ही भूल जाते थे, वे हमसे कहते थे ओ गमछे वाले भैया आपके नगरी में शाम नहीं होती क्या? हमें तो बाजार जाना है, देरी हो रही है, एक अच्छी चाय तो पिला दो, या अल्लाह हम उन्हें बता नहीं पाते थे कि उनके याद में खोए दीवाने जल्दी बाजी में सामान ले जाते थे, कभी तो शक्कर की जगह नमक ही लेते जाते थे और मिलाते वक्त भी नमक ही मिला जाते थे।
खुदा भी कमाल का था वो भी हमारा साथ देना भूल जाया करता था। हम चाहे ना देख उन्हें देखने में लग जाते थे और खूबसूरत ही ऐसी थी कि वे खुदा को भी गुमराह कर जाते थे। जब वे जान चखते थे हमारी नमक वाली चाहे तो मार हम उनसे खा जाते थे, पर खुदा भी कमाल का था उसे मेरे पीटने के बाद ही होस आता था। पर यहाँ खुदा हम पे मेहरबान, हम मार खाते तो खाते मगर वे हमें छू जरूर जाते थे।.... पर वे रोज आते हमारी ही वास्ते... आखिर शाम वाली पाव भाजी हम उन्हें फ्री में जो खिलाते थे। चाचा जी उनके थोड़ा सूखे-सूखे से रहते थे। एक बार जान को देखने के चक्कर में उन्हें गरम मिर्च की चाय क्या पिला दी? चाचा थोड़े उखड़े-उखड़े से रहते थे, पर जो भी कहो, चाचा काम बढ़िया आते थे। आखिर पाव भाजी के पैसे तो हम उन्हीं से ले जाते थे..
आखिर दोस्त की मांगी वो एक घंटे की दुकान और घर से चाय का बर्तन चुराकर लाना ना था। इतना आसान चाहते तो क्या-क्या तरकीबें लगाकर इजहार करते थे अपने प्यार का। पर हम जैसे नाचीज की क्या हस्ती थी? जब वह ईश्वर के दरवाने हमारे खुदा को ही माटी का धूल समझते थे।
हर दिन देखे तो सामने वाला पुराना हो जाता है, पर हमें तो वे हर दिन और भी ज्यादा हसीन लगने लग जाते थे। कैसे मान लेते कि इश्क एक बार होता है? उन्हें तो जितनी बार देखो, उतनी बार होता है। कुछ तो खास था उनमें जो हम उनकी सादगी पर ही मर जाते थे।
ना छुपा पाते थे ना बता पाते थे रात की बिन लाइट वाली गर्मी में जब जहान के लोग छत पर चाँद को महसूस करने जाते थे, हम तो उनकी एक झलक देखने जाते थे। रात में इतने घिरे रहते थे वे लोगों से कि इन कच्ची आँखों में पूरे समा ही नहीं पाते थे।
मानो ऐसा लगता था कि खुदा ने कायनात की सारी खुशियाँ चुराकर मेरे हाथों में रख दी हो। पर खैर वो तो दिन की रौशनी में भी हमसे अनजाने ही रह जाते थे। हर बार अलग मुखौटे में जो पाते थे, कैसी मोहब्बत थी उनके सामने जाकर भी ना उन्हें दिख सकते थे ना कुछ कह सकते थे। आँखें तिरछी कर वो हमें देखा जरूर करते थे, पर पहनावे ही इतने अतरंगी होते थे कि वे हमें पहचान नहीं पाते थे। आँखें नशीली थी हमारी तो हर बार कोई ना कोई चश्मा लगा जाते थे, क्योंकि ना चाहा करते थे कि कहीं हमें देख वे दुविधा में पड़ जाए कि पीछा उनका अकेले हमें किया करते थे। सोचा करते थे कि जीते जी उनको जो खुशियाँ ना दे पाते उन्हीं तारा होकर खातिर उनके जन्नतें जन्नतों से भी खूबसूरत सजाते। तलाशा तो उन्हें हम हर जगह किया करते थे, ना दिख पाए वो एक दिन तो मरने की जी करते थे। आँखें बंद तो पाते उन्हें वो हर जगह थे, बस कम्बख्त मार तकदीर से खा जाते थे।
कमी तो हम उन्हें किसी चीज की ना होने देते, खुद मरते तो मरते, पर उन्हें कभी ना रोने देते। अपने जीते जी जहाँ की हर खुशियाँ लाकर देते, खुदा भी अगर बीच में रोक-टोक कर देता तो मर कर जन्नतें उसी के हाथों सजवाते। जब पाते थे पास उन्हें तो सोचा करते थे कि क्या देखते होंगे खुद को ये आईने में? कभी एक बार हमारी आँखों से अगर वो चश्मा हटाते तो खुद को इतना हसीन देख बावरे ही ना हो जाते। इश्क था या इबादत समझ नहीं आता था, इतने ही खूबसूरत थे वो हमारे ख्यालों की दुनिया में खुदा भी जल जाता था।
माँ पूछा करती थी कि उम्र हो रही है तेरी कोई महबूब मिली या मैं ही चकरे लगाऊँ शहर दूसरे। अब उन्हें कैसे बताते कि महबूब क्या? मैंने तो संसार के सारे खुशियाँ उन्हें देख एक में पाया है। उनके वास्ते तो कितने झूठ भी तोड़ जाते, पर ना खून के रिश्तों को धोखा दे पाते ना शादी कर किसी और के हो पाते। वे जब आते थे हमारे पास तो एक एहसास होता था कि जरूरी नहीं मेरे उस खूबसूरत से चाँद को सितारे देकर ही खुश किया जाए। हम तो उन्हें कड़वी चाय पिलाकर भी खुश कर लिया करते थे, बस चोट यह दिल पे गहरी लगती थी कि यहाँ भी वे हमसे अनजाने ही रह जाते थे।
हमने तो खुदा से जिंदगी भर बस उन्हें देखना ही माँगा, कौन कहता है कि बिना छुए प्यार नहीं होता? हम तो उन्हें आँखों से चाहते थे कभी यह भी नहीं चाहा कि वे पूरे ही हमारे हो जाए, क्योंकि उन्हें पाने से तो मेरा खुदा भी पीछे रह जाता था। बस चाहते थे कि इतने मिल जाए कि इन कच्ची आँखों का गुजारा हो जाए। वे तो खुदा के भेजे खूबसूरत फरिश्ते थे, कोई देख लेता उनकी तरफ आँखें उठा के तो उनके जाने के बाद आशिकों के आशिकी हम मिलवाया करते थे। संभालते तो कितनों को किधर किधर संभालते, परेशानी लेकर हम फकीरों के पास जाते थे कि उन लोगों की आँखों का इलाज बताए, क्योंकि कोई उन्हें देख लेता आँखें उठाकर तो हम अपने आप में से बाहर रुझाते थे। हमारे जमाने के फकीर भी अजीब लिखा करते थे, वे कहते थे कि मोहब्बत तो आँखों से मिलती है, जिसे चाहे उसे ना छीन कर देती है। हम इसका विरुद्ध अपनी जान को बताकर किया करते थे, आखिर कैसे ना करते? वे तो आँखें झुका के ही चला करते थे।
आप लोग भी क्या बैठ गए हमारी बात सुनते सुनते? आप लोगों को देरी हो रही होगी, आपको घर जाना चाहिए। पर जरा गौर से सुनिएगा, हम तो अभी भी उन्हें याद किया करते हैं जो डरते नहीं थे उनके भगवान के विविध जाने से। आखिर पता नहीं क्या हो जाता है जब बात आती है उनके कुछ बारे से। हाय रे अल्लाह, मर मिटे हम उन पर। पर क्या कभी तेरी माफी आएगी? वैसे तो कुछ कहानियाँ बिना अलविदा कहे ही खत्म हो जाती हैं।
वे तो हमसे अब तक अनजाने ही रह गए। बता भी देते तो कभी भी हमारे नहीं होते। वक्त कटने दो, ए दो मुल्क के मालिकों, मैं खातिर उनके लिए जन्नतें जन्नतों से भी खूबसूरत सजाऊँगा। जीते जी तो जलने वालों की जलती रही, पर क्या जहाँ से ये बर्दाश्त हो पाएगा जब उनका मालिक ईश्वर ही हमारा हाथ बटाएगा। वक्त में समय है, तब तक एक शिकायत दर्ज करना चाहता हूँ हुजूर। हमारे नगरी में तो अब उनकी वो गमछे वाली भैया वाली शाम रात याद आती है। आपको देरी हो रही होगी, मगर ध्यान से सुनिएगा। पूछना चाहता हूँ दोनों मुल्क के मालिकों से कि क्या कभी गलती से भी हमारी खबर उन्हें दिलवाओगे? हमें तो पा लिया है तुमने, कब्र के भीतर कभी मेरे महबूब को मेरी याद कराओगे? पूछना चाहता हूँ उनके ईश्वर से कि कभी उन्हें ईश्वर का आशीर्वाद देकर इन मुल्लों की बस्ती खातिर हमारी गलती से ही सही, मगर उनके हाथों एक गुलाब नसीब करवाओगे।
ये वक्त इतना बदनसीब है कि किसी के जरिए अपनी बात भी नहीं पहुँचा सकते। उनका घर रास्ते में ही पड़ता है। एक विनती करूँ तो बिन कुछ लिखे मुरझाए कागज उनके द्वारे मोड़कर फेंक दीजिएगा। शायद तब तो शाम को वे जब बाहर निकले और एक कप चाय खोजे और फिरते कहीं यहाँ ना दिख जाए।


