मैं बस अभी घर आया, मैंने अपना बस्ता रख दिया है शायद हमेशा के लिए, मास्टर जी बता रहे थे वो अब नहीं आयंगे इस पगार से उनका घर नहीं चलता और यहाँ चीज़ो की व्यवस्था भी ठीक से नहीं, शहर में उन्हें अच्छे पैसे मिल जायँगे।
घर आया तो पिता जी बता रहे थे के आजकल उनका काम बहुत बड़ गया है, शहर से एक बड़ा आदमी आया है
उसे यहा एक फैक्ट्री डालनी है और काम भी जल्दी पूरा करना है, पिताजी मिस्त्री का काम करते थे अब उनको 10 के 12 घंटे लग जाते थे।
गांव वाले भी खुश है कुछ रोज़गार आएगा पर बिना शिक्षा का रोज़गार कैसा होता होगा,
अब मास्टर जी भी नहीं है वरना उनसे पूछता,
खेर कोई नहीं
वहा से माँ आ रही है सर पर मटका और बगल में मेरे भाई मुन्ना को लिए और हमेशा की तरह मुन्ना कुछ खाने में व्यस्त है, मैं भी अब घर के काम संभालूंगा माँ को भी बहुत दूर जाना पड़ जाता है एक एक काम के लिए और घर के काम सँभालते सँभालते थक जाती है घर में पैसो की दिक्कत तो आये दिन बनी ही रहती है पर इन सबमे यह पर फैक्ट्री डालना सबको एक उम्मीद दे जाता है काम भी जोरो से शुरू हो चूका है, घर से थोड़ी ही दूर से ट्रक आ और जा रहे है, आ रहे किसी के सपनो का की ईटे लिए और जा रहे कई हरे तकिये लगाए लकडिया लेकर, वाकई गांव में विकास हो रहा है, मैं भी पिताजी को अपने साथ लेजाने क लिए बोलता हु तो मना कर देते है। फैक्ट्री का इतना ज़ोरो से चल रहा है की होसकता है माँ को भी उसमे काम मिल जाये उन्हें महिलाओ की भी आवश्यकता है, फिर मून्ना की और घर की ज़िम्मेदारी भी मूझ पर बड़ जायगी।
वैसे मैं अक्सर गांव की पास वाली नदी में नहाने जाया करता हु,आज भी आया हु, पर अब मुझे यहाँ पंछियो के चहकने की आवाज़े नहीं आती यहाँ का पानी भी कुछ अजीब सा लग रहा है, बाकि बच्चो को तो जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ता।
चलो मैं तो जाता हु,अब तो माँ भी काम पर जाने लगी, मुन्ना के लिए दूध भी गरम करना है, ऐसे ही चलते चलते मुझे एक बहुत बड़ी गाडी दिखाई दी काले रंग की, लगता है वो शहर वाले बड़े आदमी की होगी,अरे हां उन्ही की है देखो तो कैसे उतर रहा है चश्मा लगाए, कोट पेन्ट पहने, पर मेरे गांव वालो ने उसे साहब साहब करके क्यों घेर लिया, मुझे क्या में तो चलता हु देर हो रही है।
चलो अच्छा है मुन्ना के उठने से पहले मैं पहुंच गया,अरे ये क्या? ये तो खांसने लगा लगता है दरवाज़ा लगाना पड़ेगा बड़ी धुल मिटटी हो गयी है यहाँ, जब से ये काम शुरू हुआ है तेरी तबियत ख़राब ही रहने लगी वैसे देख रहा है मुन्ना सब कैसे तरक्की के नाम पर बावले हुए जा रहे है ,
देख माँ भी आगयी और पानी भी भर लायी
लाओ मुझे दो माँ मैं रख देता हु,
जा मेरे लिए पानी ले आ और थोड़ा मुन्ना को भी पीला दे -माँ बोली
लो माँ और ये तुम्हारे हाथ में क्या है माँ? लगता है मुन्ना के लिए कुछ लायी हो
हां तावीज़ है, तू भी देख- माँ बोली
ये तो बड़ा सुन्दर है माँ, इसको इसके गले में पहना दू, बुरी नज़र से भी तो बचाना है ,
हां हां पहनादे, मैंने तावीज़ मुन्ना को पहना दिया ,
देखो कितना सुन्दर लग रहा है इसके गले में, माँ ने भी उसकी बलाए ली,
फिर हम कुछ समय बाद रात का खाना खाकर सोने लगे
मैं तो चुपचाप अपने आंगन में आकर सोने लगा, इस तरक्की का शोर इस वक़्त कम होजाता है, आसमान भी मुझसे कुछ बाते कर लेता है, पहले मैं इसके तारे गिन पाता था पर अब नहीं न जाने कहा गुम हो गए सब के सब ,रात में अचानक से मुन्ना के रोने की आवाज़ सुनाई दी, मैंने जाके माँ से पूछा
माँ क्या हुआ मुन्ना को ?
सुनिए जी मुझे तो लगता जबसे मुन्ना ने वो पानी पिया है तबसे इसकी तबियत ठीक नहीं लग रही, इसे डॉक्टर के पास ले चलते है, माँ पिताजी से बोली
पिताजी ने भी तुरंत मुन्ना को गोद में उठाया और डॉक्टर के पास लेकर भागे,
हम सब भागते हुए डॉक्टर के पास पहुंचे , पिताजी ने डॉक्टर के घर का दरवाज़ा खटखटाया
जल्दी खोलिये डॉक्टर साब, मुन्ना को देखिये कबसे इसकी खासी ही नहीं जा रही
डॉक्टर साहब आये,ले आओ जल्दी अंदर,
मुन्ना को पिताजी जल्दी से अंदर लेकर भागे, डॉक्टर साहब ने मुन्ना की जांच की और बोले इसके सीने में इन्फेक्शन बड़ गया है इसे जल्दी से शहर ले जाओ
मुन्ना को माँ के साथ बाहर भेजकर पिताजी बोले
कितना खर्चा आ जायगा डॉक्टर साहब इसके इलाज में
मुझे ज्यादा अंदाजा नहीं, यही कुछ हज़ार तो लगेंगे ही
आप इसको आराम आजाये अभी इतना तो कर दीजिये डॉक्टर साहब , पिताजी बोले
हां ये दवा मैं दे रहा हु पर तुम्हे जल्दी करना पड़ेगा
ठीक है, ये कहकर हम वहा से निकल गए,
हम आने के बाद आराम से सोगये, सुबह माँ और पिताजी तैयार होकर निकल ही रहे थे की माँ मुन्ना को दुलार करने के लिए उसके पास गयी, माँ ने मुन्ना को गोद में लिया पर मुन्ना के शरीर में कोई हरकत न थी माँ ने तुरंत पिताजी को आवाज़ लगाई , मैं सब सुन्न होकर देख रहा था
पिताजी ने आकर देखा तो मुन्ना हमे छोड़ कर जा चूका था, हम सब रोने लगे मुन्ना मुन्ना करके सब चिल्लाये इतने में पड़ोस के लोग भी आने लगे और माँ और पिताजी को चुप कराने की कोशिश करने लगे, हम सब टूट गए थे बड़ी मुश्किल से मुन्ना को अग्नि देने जा पाए।
दो दिन बाद एक गाडी आकर हमारे घर के आगे, हां ये उसी बड़े आदमी की थी इस बार वो अकेला नहीं था उसकी बीवी और 2 बच्चे भी उसके साथ थी, असल में तो वो उनको फैक्ट्री दिखने लाया था। वोसब अंदर आये मेरे माँ और पिताजी से बात करने लगे, मैं अब भी बस सब देख रहा था , तभी मैंने उसकी पत्नी के गले में वैसा ही हार देखा जैसा मुन्ना के गले में ताबीज़ था पर फर्क इतना था इनका सोने का था, न जाने मेरे जैसे कितने मुन्ना उस हार के लिए बलि चढ़ गए हो, पर ये बात मेरे गाओं वालो अभी भी समझ न आएगी वो बड़ा आदमी अभी भी बड़ा आदमी कहलाएगा शायद और बड़ा।


