शहर हर किसी के लिए समान नहीं होता। किसी के सोने के लिए चार बीघा तो किसी के लिए कौड़ी भर भी नहीं । रघु उर्फ़ "राघव" भी इन्हीं में से एक है, घर के नाम पर फुटपात किनारे बसी झोपड़ियों में उसकी भी एक झोपड़ी है जहां बगल की खाली जगह में अक्सर लोग कूड़ा फेंक देते हैं। पूरा परिवार एक ही झोपड़ी में रहता है, रघु के पिता रिक्शा किराए पर लेकर चलाता है। मां का अक्सर दूसरों से झगड़ा होता रहता है, कभी पानी को लेकर कलेश तो कभी कुछ और चीजों को लेकर। रघु के दो छोटे भाई बहन हैं भाई नवीं कक्षा में पढ़ता है और बहन छटी कक्षा में।
रघु संवेदनशील प्राणी है तो अपने छोटे भाई बहन को बहुत प्यार करता है ख़ुद वह दसवीं तक पड़ा है, उसके बाद उसने अपने दोस्तों के लड़कपन में अपनी पढ़ाई भी छोड़ दी।
कुछ काम न होने पर वह सुबह और शाम बोरी पकड़ कूड़ा बिनने चले जाता है। उससे कुछ पैसें बन जाते हैं तो मां को थमा देता है।
खाली समय में अपने मामा के पास जाकर वह मिस्त्री का काम भी सीख रहा होता है, छोटे भाई बहनों की छोटी जरूरतों पूरा करने की कोशिश करता है, रघु घर का बड़ा बेटा होने के कारण उसके बड़े व्यक्तिव के गुण उसमें बचे रहते हैं, अक्सर गरीबी गुणों की विपरीत होती है मगर रघु का संवेदनशील होना उसके गुणों को संभाले रखती है वह खुद को आगे बढ़ता देखना चाहता है।
एक दिन शाम रघु घर आता हैं तो उसकी झोपड़ी में आग लगी रहती है।
रघु जब तक पानी की बाल्टी लाता तब तक सब कुछ जल चुका होता है। पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है बाप घर आता है तो गुस्से में रघु की मां को पीटने लगता है।
जो कुछ भी थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी वो भी जल चुकी होती है
पूरा परिवार सड़क किनारे बैठा शोक मना रहा होता है शाम गुज़र जाती है। रघु को अपने परिवार का दुख सहा नहीं जाता वह अपनी जेब से तीस रुपए निकालता है, जो वो कूड़े बिन कर कमा ले आया था, उसे अपनी मां के हाथ में थमा कर। एक सांस में सड़क के एक छोर की तरफ़ भागने लगता है।
उसकी मां उसे आवाज देती है "हे रघु, रघु कहां जारा है रे ... मगर रघु पीछे मुड़ कर नहीं देखता और भागता जाता है भागता जाता है,भट्टी की तरह लाल उसकी आंखें उस पल उसको बयां करती हैं।
हरीश रावत।

